शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

नेता असभ्य क्यों होते जा रहे हैं?


ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।

कबीर दास जी का यह दोहा हमें बचपन से ही सिखाता आया है कि चाहे कुछ भी हो हमें ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को आनंदित करे। जहां मीठे वचन सुनने वालों को सुख देते हैं, वहीं हमारे मन को भी आनंदित करते हैं। परंतु क्या हमारे द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधि इसका अनुसरण कर रहे हैं? या सत्ता के अहंकार में आपा खो रहे हैं। भारत के नये संसद भवन के पहले सत्र में जो हुआ, वो अनहोनी बात थी। नई संसद के पहले सत्र में ऐसा होना देश के लोकतंत्र के लिए बहुत शर्मनाक है।


ऐसा नहीं है कि संसद या विधान सभा में हंगामा पहली बार हुआ है कि जब सदन की गरिमा को वहाँ बैठे नेताओं ने तार-तार किया। ऐसा भी नहीं है कि संसद में ऐसी असभ्यता केवल भारत में ही होती है। दुनिया के कई देशों में आजकल ऐसे दृश्य दिखाई देने लगे हैं। हम इसकी केवल निंदा करके छोड़ देते हैं। ऐसी घटनाओं से कोई भी सबक़ नहीं लेता। जब भी कभी, किसी भी दल के नेता द्वारा, सदन में या सदन के बाहर असभ्यता का परिचय दिया जाता है तो उसके आचरण से न सिर्फ़ उस नेता के पारिवारिक संस्कार बल्कि उसके दल के संस्कारों का भी परिचय मिलता है। उनकी छवि पर इसका बुरा असर पड़ता है, अगर उन्हें अपनी छवि की चिंता हो तो।


कोई मशहूर व्यक्ति न सिर्फ़ राजनीति में बल्कि किसी भी अन्य क्षेत्र में क्यों न हो अगर शांत और शालीन स्वभाव के हैं तो उनका ज़िक्र हमेशा सम्मान के साथ ही होता है। वहीं जब भी कभी कोई नेता अपने बुरे व्यवहार या कटु वचनों के कारण चर्चा का विषय बनते हैं तो वे इस बात से बेख़बर होते हैं कि उनके ऐसे व्यवहार से उनके वोटरों पर कितना विपरीत असर पड़ता है। पर आजकल तो वोटर भी ऐसे होते जा रहे हैं जो अनेक अन्य कारणों से ऐसे ही नेताओं को पसंद करते हैं। राजनैतिक दलों की बात करें तो सत्ता में बने रहने के लिए उन्हें भी अधिक वोट दिलाने वाली ऐसी दुधारू गायों की ज़रूरत पड़ती रहती है, जो हंगामा खड़ा करके ध्यान आकर्षित करें।

असभ्य नेता जब सदन में होते हैं तो वो भूल जाते हैं कि उनके विपक्ष में बैठे नेता भी एक जनप्रतिनिधि हैं। वो भी उतने ही सम्मान के हक़दार हैं जितने कि वे स्वयं को मानते हैं। परंतु सत्ता के नशे में चूर कुछ नेता, चाहे किसी भी दल के क्यों न हों अपने विपक्षी नेताओं को आजकल आम जनता की तरह समझने लगे हैं।


नेताओं द्वारा असभ्य व्यवहार किसी भी तरह का हो सकता है। फिर वो चाहे किसी धर्म विशेष के प्रति हो या किसी जाति या वर्ग के प्रति हो, ऐसे असभ्य नेता कभी भी कोई मौक़ा नहीं छोड़ते। इन असभ्य नेताओं को, यदि वे सत्तारूढ़ दल के हों, उनके दल का समर्थन प्राप्त हो, तो वे किसी की भी परवाह नहीं करते। ऐसे में कोई आम नागरिक यदि किसी सभा में इनसे इनकी असभ्यता पर सवाल भी उठाए तो वे घमंड के चलते उनके सवाल का उत्तर नहीं देते। वहीं यदि कोई पत्रकार इन नेताओं से सवाल पूछे तो उसे इस बात की गारंटी नहीं होती कि ऐसे नेताओं से सवाल पूछने पर उसकी नौकरी बरकरार रहेगी या जायेगी। इसलिए ऐसे असभ्य नेता हमारे समाज में बेख़ौफ़ घूमते हैं।


यदि किसी एक दल के नेता को किसी अन्य दल के नेता के ख़िलाफ़ की गई अपमानजनक टिप्पणी के लिए दोषी पाया जाता है तो उसके ख़िलाफ़ लोकसभा या राज्य सभा या विधान सभा के स्पीकर कारवाई कर सकते हैं। अन्यथा उन पर क़ानूनी करवाई की जा सकती है, अगर उन्होंने ऐसा व्यवहार सदन के बाहर किया हो। अदालत यदि ऐसे नेता को दोषी मानती है तो उसे क़ानून के हिसाब से सज़ा भी सुना सकती है। परंतु जब भी कभी सत्तापक्ष के किसी नेता द्वारा ऐसी गलती होती है तो विपक्षी दल के नेता की गलती पर कड़ी से कड़ी सज़ा की माँग करने वाले सत्तारूढ़ दल अपने ही दल के नेता को एक नोटिस दिलवाकर केवल औपचारिकता ही करवाता है। सरकारें आती जाती रहतीं हैं पर यह मानसिकता क़ायम रहती है।

मामला किसी धर्म विशेष के लोगों पर हमले का हो या किसी जाति या वर्ग के लोगों पर हमले का हो, ऐसे हमले रुकने चाहिए। भारत जैसे देश के लिए कहा जाता है कि ‘चार कोस कोस पर पानी बदले आठ कोस पर वाणी’ यानी हमारे देश में विविधताओं का होना प्राचीन युगों से चला आ रहा है। भारत में अनेक धर्मों, जातियों, विचारों, संस्कृतियों और मान्यताओं से सम्बन्धित विभिन्नताएँ हैं। किन्तु उनके मेल से एक खूबसूरत देश का जन्म हुआ है, जिसे हम भारत कहते हैं। भारत की ये विविधताएँ एकता में बदल गई हैं, जिसने इस देश को विश्व का एक सुन्दर और सबल राष्ट्र बना दिया है। शायद इसीलिए भारत के लिए कहा गया है कि ‘अनेकता में एकता : मेरे देश की विशेषता’। इसलिए हमें सभी धर्मों, विचारधाराओं और संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए।

हमारे द्वारा चुने गये नेता, चाहे किसी भी दल के क्यों न हों, चुनाव जीतते ही यदि अपनी असभ्यता का परिचय देने लग जाएँ और उनके दल द्वारा उन्हें किसी भी तरह दंड न दिया जाए। तो अगली बार जब भी ऐसे नेता जनता के सामने याचक बन कर आएँ तो वोटरों द्वारा ऐसे नेताओं का बहिष्कार कर उन्हें आईना ज़रूर दिखाया जाए। ऐसा करने से इन असभ्य नेताओं में एक मज़बूत संदेश जाएगा और वे ऐसी गलती करने से पहले कई बार सोचेंगे। तब शायद उन्हें कबीरदास जी का दोहा याद आएगा।  

शुक्रवार, 22 सितंबर 2023

चीनी: इस मीठे ज़हर से बचें


हद से ज़्यादा हर चीज़ का सेवन करना हमारे शरीर के लिये हानिकारक होता है। यह बात हर उस चीज़ पर लागू होती है जिसका हम अपने जीवन में ज़रूरत से ज़्यादा सेवन करते हैं। ऐसी ही एक चीज़ है चीनी। यह एक ऐसा मीठा ज़हर है जिसे हम जाने-अनजाने अपने शरीर में बेवजह बढ़ाते जाते हैं। परंतु इस बात से हम अभिज्ञ रहते हैं कि जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है हमारे शरीर में रोगों से लड़ने की ताक़त भी कम होने लगती है। यदि हम हर चीज़ का सेवन एक संतुलित मात्रा में करें तो कभी कोई परेशानी नहीं होगी। 
 

हर घर में आसानी से मिलने वाली सफ़ेद चीनी हमारे शरीर के लिए कितनी नुक़सानदेह हो सकती है, इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। बीते कई दशकों से कम उम्र में डायबिटीज, मोटापा, किडनी व लिवर के रोग, कोलेस्ट्रॉल बढ़ने जैसी समस्याएं होना सामान्य बात हो गई है। इसका एक कारण अधिक मात्रा में चीनी का उपयोग भी है। हम अक्सर ऐसे कई प्रोसेस्ड खाद्य उत्पादों का सेवन करने लगते हैं जिनमें केमिकल रिफाइंड शुगर या सफ़ेद चीनी पाई जाती है। इन पदार्थों में चीनी की मात्रा का पता नहीं चलता और अनजाने में हम अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हैं। जब तक हमें एहसास होता है तब तक काफ़ी देर हो चुकी होती है। 
 

अधिक मात्रा में चीनी का सेवन करने से हमें ऐसी कई ख़तरनाक बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है जिनका इलाज लंबा चलता है और काफ़ी महँगा भी होता है। विश्व भर में आजकल हृदय रोग, मौत का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। अधिक मात्रा में चीनी युक्त खाद्य पदार्थ खाने से हृदय रोग होने की संभावना भी बढ़ जाती है। एक शोध के अनुसार अधिक मात्रा में चीनी युक्त आहार से मोटापा, सूजन, उच्च ट्राइग्लिसराइड, रक्त शर्करा और रक्तचाप का स्तर हो सकता है। ये सभी दिल की बीमारी के खतरे को बढ़ाने वाले कारण होते हैं। एक अध्ययन में पाया गया है कि जो लोग ज़्यादा चीनी का सेवन करते हैं वे 17-21% अतिरिक्त कैलोरी लेते हैं। इन लोगों में हृदय रोग से मौत का खतरा लगभग 38% अधिक होता है।   
 
वैज्ञानिकों का मानना है कि अधिक चीनी के उपयोग से इंसुलिन पर पड़ने वाला हानिकारक प्रभाव जैसे शरीर में सूजन आना, कैंसर का भी कारण बन सकता है। कई शोधों में यह साबित भी हो चुका है कि अधिक चीनी लेने वाले लोगों को कैंसर होने का खतरा अधिक होता है। इतना ही नहीं ज़्यादा मीठा खाने से हमारे खून में यूरिक एसिड बढ़ाते हैं। इस कारण ब्लडप्रेशर और गठिया जैसी परेशानी भी हो सकती है। इसके साथ ही चीनी को अधिक मात्रा में लेने से शरीर में भूख और वजन नियंत्रित करने वाले सिस्टम पर भी बुरा असर पड़ता है।
 
डॉक्टरों के अनुसार मीठा या शक्कर ‘ग्लूकोज’ के रूप में हो तो वह ठीक है। परंतु यही जब ‘फ्रुक्टोस’ के रूप में होता है वह हमें दिक्कत दे सकता है। इसका हमारे शरीर, दिमाग और हार्मोन पर अलग प्रभाव पड़ सकता है। ग़ौरतलब है कि शराब व अन्य नशीली चीजों की तरह चीनी भी दिमाग में ‘डोपामाइन’ नामक हार्मोन का स्राव बढ़ाती है। ऐसे में चीनी की लत लग जाती है, जो मानव शरीर के लिए काफ़ी हानिकारक है। 
 

संतुलित मात्रा में मीठा लेने पर हमारा लीवर उसे ‘ग्लाइकोजेन’ में बदलकर जमा कर लेता है। ज़रूरत पड़ने पर लीवर में जमा ग्लाइकोजेन काम में लिया जाता है। इसी तरह ज्यादा मात्रा में फ्रुक्टोस लेने पर लीवर को इसे फैट में बदलना पड़ता है। ऐसा करने से हमारे लीवर पर अधिक भार पड़ता है। जैसे ही अधिक फ्रुक्टोस फैट का रूप ले लेता है, इसकी कुछ मात्रा हमारे खून में भी चली जाती है। जो हृदय रोग या हार्ट अटैक का कारण भी बन जाती है। अधिक फैट का लिवर में जमा होने के कारण ‘फैटी लिवर’ जैसी बीमारी भी हो सकती है, जिसे समय पर ठीक नहीं किया जाए तो वो आगे चल कर ‘लिवर सिरोसिस’ का रूप भी ले सकती है।
 
एक संतुलित आहार में मीठा ख़ाना भी आवश्यक है। इसलिए हमें केमिकल से प्रोसेस की जाने वाली सफ़ेद चीनी से जहां तक हो सके बचने कि ज़रूरत है। इसके साथ ही हमें अपने शरीर में मीठे की पूर्ति के लिए गुड़ या ताज़े फलों का सेवन करना चाहिए। यदि हम खाना खाने के बाद गुड़ का एक टुकड़ा खाते हैं तो ये ना सिर्फ़ ख़ाना पचाने में मदद करता है बल्कि शरीर से अधिक विषाक्त पदार्थों यानी टॉक्सिन्स को भी आसानी से बाहर निकाल देता है। चीनी और गुड़ दोनों ही शरीर में कैलोरी को बढ़ाते हैं, लेकिन यदि आपको दोनों में से किसी एक को  चुनना हो तो आप गुड़ का चुनें। क्योंकि केमिकल द्वारा रिफाइन की गई सफ़ेद चीनी से इसके फायदे कहीं ज्यादा होते हैं। गुड़ में आयरन, कैल्शियम, जिंक, पोटैशियम, मैग्नीशियम और सेलेनियम की मात्रा अधिक होती है जो ‘खून की कमी’ जैसी बीमारी में बहुत फायदेमंद होता है। 
 
समय रहते अगर हम अपने जीवन में बदलाव लाएँगे तो हम लंबी और स्वस्थ ज़िंदगी जियेंगे। इसलिए जहां तक हो सके हमें कैमिकल द्वारा रिफाइन की गई चीनी का सेवन कम कर देना चाहिए। यह एक ऐसा मीठा ज़हर है जो आसानी से मिल भी जाता है और हमें धीरे-धीरे मारने का काम करता है।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

सही संस्कार हैं तनाव से मुक्ति का उपचार

अक्सर यह देखा जाता है कि तनाव के कारण छात्र हों, युवा हों या कोई समझदार व्यक्ति, ऐसा क़दम उठा लेते हैं जिसके कारण उन्हें और उनके परिवार को काफ़ी पछताना पड़ता है। तनाव ग्रस्त इंसान ग़लत संगत में पड़  जाता है और ग़लत राह पर चलने लग जाता है, जैसे नशा और जुआ आदि की लत लगना। मानसिक तनाव के कारण कभी-कभी कठोर कदम उठाते हुए वो व्यक्ति आत्महत्या तक कर डालता है। आए दिन हमें ऐसी खबरें मिलती हैं जहां परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र प्रतिस्पर्धा की दौड़ में ऐसे कदम उठाते हैं। जिन छात्रों को उनके परिवार से यदि सही संस्कार मिलते हैं वो कभी भी ऐसा कदम नहीं उठाते। वो समस्या का सामना करते हैं और उसके निदान का मार्ग खोज लेते हैं। 
 

राजस्थान के शहर कोटा को ‘कोटा फैक्ट्री’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर देश भर के छात्र ख़ुद को आईआईटी व मेडिकल में भर्ती कराने की मंशा से विभिन्न कोचिंग केंद्रों में दाख़िला लेते हैं। यह कोचिंग परीक्षाओं में छात्रों को उत्तीर्ण कराने के लिए प्रशिक्षण देते हैं। जिस भी कोचिंग सेंटर के छात्रों का नतीजा सबसे अच्छा होता है उस कोचिंग सेंटर की फ़ीस भी उसी अनुसार होती है। छात्रों को सबसे अच्छे कोचिंग केंद्र में भर्ती दिलाने के लिए उनके माँ बाप अपनी क्षमता अनुसार हर वो कोशिश करते हैं जो उन्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने में सहायक हो। परंतु अहम बात है कि क्या आजकल माँ-बाप या स्कूल बच्चों को सही संस्कार दे रहे हैं? ये वो संस्कार हैं जो शास्त्रों पर आधारित हैं। इन्हीं संस्कारों की नींव पर हमारे बच्चों का भविष्य खड़ा होता है। यदि नींव मज़बूत हो तो बड़े से बड़े तूफ़ान का भी सामना किया जा सकता है। 
 

वृंदावन के सुप्रसिद्ध रसिक संत श्री हित प्रेमानंद स्वामी जी का एक वीडियो आजकल काफ़ी वायरल हो रहा है। इस वीडियो में स्वामी जी से एक टीवी पत्रकार ने पूछा कि कोटा में छात्रों द्वारा हो रही आत्महत्याओं को कैसे रोका जा सकता है? तो स्वामी जी का कहना था कि, “यदि हम अध्यात्म को नहीं समझेंगे और न ही समझाएँगे तो चाहे किसी भी पद पर पहुँच जाओ आपका पतन होना निश्चित ही है।” अध्यात्म का अर्थ समझाते हुए स्वामी जी कहते हैं कि, “धर्म के मार्ग पर चलना व कर्तव्य का बोध होना ज़रूरी है। बिना आध्यात्मिक ज्ञान के लौकिक उन्नति के प्रयास में उत्साह आना असंभव है। जब तक माता-पिता अपने बच्चों को आध्यात्मिक ज्ञान नहीं देंगे तब तक बच्चों में कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस नहीं आएगा। बुरी संगत में पड़ते ही बच्चों का ख़ान-पान भी बिगड़ जाता है। जिससे उनकी स्मरण शक्ति पर असर पड़ता है। इसका नतीजा ये होता है कि बच्चे परीक्षा में सही से प्रदर्शन नहीं कर पाते और प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं। इन सबके ऊपर इस बात का दबाव भी होता है कि माता-पिता उन पर इतना पैसा ख़र्च कर रहे हैं और वो उसे व्यर्थ कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में वो अज्ञानतावश ग़लत कदम उठा लेते हैं।” 
 

स्वामी जी कहते हैं कि, “यदि माता-पिता में अध्यात्म का ज्ञान हो तो वो अपने बच्चों को उत्साहित करेंगे। वो बच्चों पर दबाव नहीं डालेंगे। वो बच्चों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करेंगे कि यदि किसी कारण से उनके बच्चे परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाए तो वो घबराएँ नहीं। यदि उन्हें कोई उच्च सरकारी पद नहीं मिल पाया तो कोई बात नहीं। वो जिस भी श्रेणी में आए हैं उन्हें उसी के अनुसार कुछ न कुछ पद तो मिल ही जाएगा। यदि कुछ भी नहीं मिला तो वे अपने बच्चों को किसी न किसी रोज़गार पर लगा ही देंगे। ऐसा करने से बच्चों को यह पता रहेगा कि चाहे कुछ भी हो जाए उन्हें माता-पिता का सहारा है। ऐसे में वो कभी भी ग़लत कदम नहीं उठाएँगे। यदि हमें आत्महत्या जैसी घटनाओं को रोकना है तो इस बात पर ज़ोर देना होगा कि असफल होने से हतोत्साहित नहीं होना चाहिए। निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। यह बात केवल छात्रों पर लागू नहीं होती, किसान, व्यापारी या कोई भी अन्य जो असफल होने पर हतोत्साहित होते हैं, उन्हें सबसे पहले अपने परिवार में इस बात की चर्चा करनी चाहिए और समस्या का हल निकालना चाहिए। यदि हमारे अंदर आध्यात्मिक ज्ञान है तो कोई भी ग़लत कदम उठाने से पहले हम हमेशा ठंडे दिमाग़ से अपने परिवार में चर्चा करेंगे। चर्चा करने से कोई न कोई हल अवश्य निकलेगा। 
 

आज के युग में हर स्कूल में, हर अध्यापक को, छात्रों से भले कुछ ही क्षण के लिए ही सही, आध्यात्मिक चर्चा अवश्य करनी चाहिए। ऐसी चर्चा से छात्रों के मन में उत्साह बढ़ेगा। वो चाहे किसी भी धर्म का क्यों न हो ऐसी चर्चा से वे कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस मिलेगा। ऐसा ही कुछ हर उस क्षेत्र में होना चाहिये जहां प्रतिस्पर्धा की दौड़ में लोगों पर दबाव है और वो तनाव का कारण बना हुआ है। फिर वो चाहे सरकारी नौकरी हो, पुलिस या फ़ौज हो, बड़े कॉर्पोरेट संस्थान हों या कोई अन्य क्षेत्र हों। तनाव मुक्ति के लिए आध्यात्मिक चर्चा का मार्ग ही सबसे कामयाब रास्ता है। इसलिए हम चाहे किसी भी धर्म को क्यों न मानें हमें दिन में कुछ क्षण निकाल कर आध्यात्मिक चिंतन अवश्य करना चाहिए, चाहे किसी भी माध्यम से ही क्यों न हो। आध्यात्मिक संस्कारों और चिंतन से ही हम बड़े से बड़े तनावों से मुक्ति पा सकेंगे।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2023

नरेश गोयल की गिरफ़्तारी से उठे सवाल


किसी समय देश की सबसे बड़ी निजी एयरलाइन जेट एयरवेज़ एक बार फिर से चर्चा में है। इस बार चर्चा का कारण जेट के स्वामी नरेश गोयल हैं जिन्हें प्रवर्तन निदेशालय ने बैंक से धोखाधड़ी के मामले में गिरफ़्तार किया। परंतु नरेश गोयल द्वारा चलाई जाने वाली जेट एयरवेज़ केवल बैंक के साथ ही धोखाधड़ी नहीं कर रही थी। बैंक के साथ धोखा तो नरेश गोयल द्वारा की गड़बड़ियों में से एक है। असल में तो उनके द्वारा कि गई धाँधलियों कि सूची बहुत बड़ी है। सवाल उठता है कि क्या सरकारी एजेंसियों द्वारा नरेश गोयल की हर गड़बड़ियों की जाँच होगी?

जब भी कभी हम किसी बड़े उद्योगपति द्वारा किसी घोटाले के बारे में सुनते हैं तो यह अंदाज़ा लगा लेते हैं कि वो भी विजय माल्या, नीरव मोदी या मेहूल चौकसी जैसों की तरह अपने रसूख़ के चलते सज़ा से बच जाएगा या देश छोड़ कर भाग जाएगा। परंतु नरेश गोयल के मामले में ऐसा नहीं हुआ। इसके लिए सरकारी एजेंसियाँ बधाई की पात्र हैं। देर से ही सही पर नरेश गोयल पर शिकंजा कसने की शुरुआत तो हुई।


नरेश गोयल की जेट एयरवेज़ की बात करें तो नागर विमानन क्षेत्र में शायद ही ऐसे किसी नियम का उल्लंघन होगा जो इनकी कंपनी ने न किया हो। साल 2014 में एक खबर काफ़ी प्रमुखता से छपी थी जिसके अनुसार, जेट एयरवेज़ को अपने 131 पायलेट घर बैठाने पड़े। क्योंकि ये पायलेट ‘प्रोफिशियेसी टेस्ट’ पास किए बिना हवाई जहाज उड़ा रहे थे। इस तरह जेट के मालिक नरेश गोयल देश-विदेश के करोड़ों यात्रियों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे थे। हमारे कालचक्र समाचार ब्यूरो ने इस घोटाले का पर्दाफाश किया, जिसका उल्लेख कई टीवी चैनलों ने किया। यह तो केवल एक ट्रेलर मात्र था। ऐसी गंभीर गलती बिना नागर विमानन मंत्रालय और उसके अधीन विभागों के अधिकारियों की मिलीभगत बिना होना संभव नहीं था। जेट एयरवेज़ द्वारा यात्रियों के साथ धोखाधड़ी और देश के साथ गद्दारी के दर्जनों प्रमाण लिखित शिकायत करके हमने केंद्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआई में दाखिल किए और उन पर उच्च स्तरीय पड़ताल जारी हुई। परंतु जैसे ही जेट एयरवेज़ ने ख़ुद को दिवालिया घोषित किया यह सभी जाँचें ठंडे बस्ते में पड़ गईं।


डी.जी.सी.ए. और जेट एयरवेज़ की मिलीभगत का एक और उदाहरण विदेशी मूल के कैप्टन हामिद अली है, जो 8 साल तक जेट एयरवेज़ का सीओओ बना रहा। जबकि भारत सरकार के नागर विमानन अपेक्षा कानून के तहत (सी.ए.आर. सीरीज पार्ट-2 सैक्शन-3) किसी भी एयरलाइनस का अध्यक्ष या सीईओ तभी नियुक्त हो सकता है, जब उसकी सुरक्षा जांच भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा पूरी कर ली जाए और उसका अनापत्ति प्रमाण पत्र ले लिया जाए। अगर ऐसा व्यक्ति विदेशी नागरिक है, तो न सिर्फ सीईओ, बल्कि सीएफओ या सीओओ पदों पर भी नियुक्ति किए जाने से पहले ऐसे विदेशी नागरिक की सुरक्षा जांच नागर विमानन मंत्रालय को भारत सरकार के गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से भी करवानी होती है। पर देखिए, देश की सुरक्षा के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ किया गया कि कैप्टन हामिद अली को बिना सुरक्षा जांच के नरेश गोयल ने जेट एयरवेज़ का सीओओ बनाया। यह जानते हुए कि वह बहरीन का निवासी है और इस नाते उसकी सुरक्षा जांच करवाना कानून के अनुसार अति आवश्यक था। क्या डी.जी.सी.ए. और नागर विमानन मंत्रालय के तत्कालीन महानिदेशक व सचिव और उड्डयन मंत्री आंखों पर पट्टी बांधकर बैठे थे, जो देश की सुरक्षा के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ होने दिया गया और कोई कार्यवाही जेट एयरवेज़ के खिलाफ नहीं हुई। जिसने देश के नियमों और कानूनों की खुलेआम धज्जियां उड़ाईं।

इसका तथ्य का खुलासा तब हुआ जब 31 अगस्त, 2015 को मेरे द्वारा आरटीआई के जवाब पर नागरिक विमानन मंत्रालय ने स्पष्टीकरण दिया। इस आरटीआई के दाखिल होते ही नरेश गोयल के होश उड़ गए और उसने रातों-रात कैप्टन हामिद अली को सीओओ के पद से हटाकर जेट एयरवेज़ का सलाहकार नियुक्त कर लिया। पर, क्या इससे वो सारे सुबूत मिट गये, जो 8 साल में कैप्टन हामिद अली ने अवैध रूप से जेट एयरवेज़ के सीओओ रहते हुए छोड़े हैं। जब मामला विदेशी नागरिक का हो, देश के सुरक्षा कानून का हो और नागरिक विमानन मंत्रालय का हो, तो क्या इस संभावना से इंकार किया जा सकता है कि कोई देशद्रोही व्यक्ति, अन्डरवर्लड या आतंकवाद से जुड़ा व्यक्ति जान-बूझकर नियमों की धज्जियां उड़ाकर इतने महत्वपूर्ण पद पर बैठा दिया जाए और देश की संसद और मीडिया को कानों-कान खबर भी न लगे। देश की सुरक्षा के मामले में यह बहुत खतरनाक अपराध हुआ है। जिसकी जवाबदेही न सिर्फ नरेश गोयल की है, बल्कि तत्कालीन नागरिक विमानन मंत्रालय के मंत्री, सचिव व डी.जी.सी.ए. के महानिदेशक की भी पूरी है।

मोदी सरकार के कड़े रुख़ के चलते जिस तरह नरेश गोयल को देश छोड़ कर भागने पर प्रतिबंध लगा वो सराहनीय है। नहीं तो अब तक नरेश गोयल भी अन्य अपराधियों की तरह कब के देश छोड़ कर जा चुके होते और भारत की जाँच एजेंसियाँ इन्हें पकड़ नहीं पाती। देखना यह है कि क्या केवल 538 करोड़ के बैंक घोटाले में ही गोयल की जाँच होगी या ईडी इनके द्वारा किए गये अन्य वित्तीय घोटालों की जाँच भी करेगी? सरकार को इनकी अकूत संपत्ति को ज़ब्त कर न सिर्फ़ बैंकों को पैसा वापिस करना चाहिए बल्कि जेट एयरवेज़ के सभी कर्मचारियों की बकाया सैलरी भी दिलवानी चाहिए। सरकार की अन्य जाँच एजेंसियों को भी नरेश गोयल द्वारा की गई बाक़ी की गड़बड़ियों की जाँच में भी जुट जाना चाहिए। इस सब की लिखित शिकायतें सीबीआई व सीवीसी के पास आज भी पड़ी धूल खा रही हैं। यदि जाँच एजेंसियों द्वारा ऐसा होता है तो ऐसा करने वाले उन सभी अपराधियों के पास एक कड़ा संदेश जाएगा कि भले आप कितने भी बड़े क्यों न हों क़ानून आपसे ऊपर है।    

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

क्या हो आवारा पशुओं की समस्या का समाधान



जी20 शिखर सम्मेलन की तैयारी में देश की राजधानी दिल्ली को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है। केंद्र और दिल्ली की सरकार इस सम्मेलन को कामयाब करने की दृष्टि से हर वो कदम उठा रही है जिससे कि इसमें शिरकत करने वाले विदेशी मेहमानों को किसी भी तरह की असुविधा न हो। दिल्ली को सजाने के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था के चलते भी कई कदम उठाए गये हैं। इसके साथ ही दिल्ली के कुछ इलाक़ों से आवारा कुत्तों को हटाने के आदेश भी जारी हुए थे, जिसे पशु प्रेमियों के विरोध के चलते रद्द किया गया। आदेश का विरोध कर, पशु प्रेमियों ने इसे आवारा कुत्तों के हित में बताया है। परंतु यहाँ सवाल उठता है कि इस समस्या से छुटकारा कैसे मिले?     
 
शहरों में आवारा कुत्तों की समस्या हर दिन बढ़ती जा रही है। आम जनता को हर गली मोहल्ले में आवारा कुत्तों से खुद को बचा कर निकलना पड़ता है। यदि इन कुत्तों से बचने के लिए हम इन्हें लाठी, डंडा या पत्थर का डर दिखाते हैं तो पशु प्रेमी इसका विरोध करते हैं। कुछ जगहों पर तो ये लोग नागरिकों को पुलिस की कार्यवाही की धमकी तक दे देते हैं। परंतु क्या कभी किसी पशु प्रेमी ने इस समस्या का हल खोजने की कोशिश भी की है? क्या कारण है कि आवारा कुत्तों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है?  
 

आवारा कुत्तों परिभाषित करें तो यह तीन प्रकार के होते हैं। पहले वो जो किसी भी इलाक़े में आराम से घूमते हैं और वहाँ के स्थानीय नागरिकों पर निर्भर रहते हैं और उनके दिये खाने पर जीवित रहते हैं। दूसरे वो जो पहले प्रकार की तरह ही होते हैं लेकिन वो किसी पर निर्भर नहीं रहते। वो इलाक़े के कूड़े आदि में से अपने खाने का इंतज़ाम कर लेते हैं। तीसरे वो, जिन पालतू कुत्तों को उनके स्वामी बेघर कर देते हैं। पहले और दूसरे प्रकार के कुत्ते किसी न किसी तरह से जीवित रह पाते हैं क्योंकि वो सड़कों पर रहने के आदि हो जाते हैं। जो भी खाने को मिल जाए उससे संतुष्ट रहते हैं। जबकि तीसरे प्रकार के कुत्तों को इन सबकी आदत नहीं होती और वो या तो दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं या गंदा ख़ाना खाने से बीमार पड़ जाते हैं। इनमें से किसी भी आवारा कुत्ते को रेबीज़ जैसी घातक बीमारी हो जाए और वो कुत्ता किसी को काट ले तो उस व्यक्ति की तो जान पर बन आती है।
 
जी20 शिखर सम्मेलन से पहले जब दिल्ली नगर निगम ने यह आदेश दिया कि आवारा कुत्तों को कुछ इलाक़ों से हटा कर किसी सुरक्षित स्थान पर भेजा जाएगा, तो लगा कि यह एक अच्छी पहल है। जिस तरह देश भर में कई सामाजिक संस्थाएँ गौवंश की सुरक्षा कि दृष्टि से गौशाला चलाती हैं। उसी तरह क्यों न आवारा कुत्तों के लिए भी ‘डॉग शेल्टर’ जैसी कोई योजना बनाई जाए जहां आवारा कुत्तों को एक सुरक्षित माहौल में रखा जाए। यहाँ पर इन बेज़ुबानों के इलाज की भी उचित व्यवस्था हो। जिन भी पशु प्रेमियों को इन बेज़ुबानों के प्रति अपना वात्सल्य दिखाने की कामना हो वे समय निकाल कर वहाँ नियमित रूप से जाएँ और न सिर्फ़ उनको ख़ाना खिलाए बल्कि उनके साथ समय भी बिताएँ। ऐसा करने से न तो किसी पशु पर अत्याचार होगा और न ही ऐसे आवारा कुत्तों से किसी आम नागरिक को कोई ख़तरा होगा।
 
दुनिया भर में केवल नीदरलैंड ही एक ऐसा देश है जहां पर आपको आवारा कुत्ते नहीं मिलेंगे। यहाँ की सरकार द्वारा चलाए गये एक विशेष कार्यक्रम के तहत वहाँ के हर कुत्ते को सरकार द्वारा इकट्ठा कर उसकी जनसंख्या नियंत्रण करने वाले टीके लगाए जाते हैं। रेबीज़ जैसी बीमारियों से बचाव का टीकाकरण किया जाता है। उसके पश्चात या तो उन्हें उनके स्वामी के पास वापिस भेज दिया जाता है या उस इलाक़े में छोड़ दिया जाता है जहां से उसे लाया गया था। दुनिया भर के पशु प्रेमियों के संगठनों ने इस कार्यक्रम को सबसे सुरक्षित और असरदार माना है। इस कार्यक्रम से न सिर्फ़ आवारा कुत्तों की जनसंख्या पर रोक लगती है बल्कि आम नागरिकों को भी इस समस्या से निजाद मिलता है। 
 
इसके साथ ही नीदरलैंड सरकार ने एक नियम भी लागू किया गया। किसी भी पालतू पशु की दुकान से ख़रीदे गये कुत्तों पर सरकार भारी मात्रा में टैक्स लगती है। वहीं दूसरी ओर यदि कोई भी नागरिक इन बेघर पशुओं को गोद लेकर अपनाता है तो उसे आयकर में छूट भी मिलती है। इस नियम के लागू होते ही लोगों ने अधिक से अधिक बेघर कुत्तों को अपनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे नीदरलैंड की सड़कों व मोहल्लों से आवारा कुत्तों की संख्या घटते-घटते बिलकुल शून्य हो गई।       
 

मामला केरल का हो, आगरा का हो, दिल्ली एनसीआर का हो या मुंबई का हो, देश भर से ऐसी खबरें आती हैं जहां कभी किसी बच्चे को, किसी डिलीवरी करने वाले को या किसी बुजुर्ग को इन आवारा पशुओं का शिकार होना पड़ता है। अगर कोई अपने बचाव में कोई कदम उठाए तो पशु प्रेमी बवाल खड़ा कर देते हैं। यदि हर शहर के पशु प्रेमी संगठित हो कर भारत सरकार को नीदरलैंड के मॉडल पर चलने का सुझाव दें तो वो दिन दूर नहीं जब हमारा देश भी आवारा पशुओं से मुक्त हो जाएगा।   
 
इसलिए ज़रूरी है कि आवारा कुत्तों के हक़ के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्ट इस बात का ध्यान दें कि उनकी ज़िम्मेदारी केवल बेज़ुबान पशुओं के प्रति ही नहीं बल्कि समाज के प्रति भी है। इसलिए इन एक्टिविस्टों को अपने गली मोहल्ले में सभी आवारा पशुओं को चिन्हित कर उनका पंजीकरण करवाना चाहिए। उनका टीकाकरण करवाना चाहिए। यदि उन आवारा पशुओं द्वारा किसी व्यक्ति को काट लिया जाता है या उसकी संपत्ति को नुक़सान पहुँचाया जाता है तो उसकी भरपाई और इलाज के लिए इन एक्टिविस्टों को ही ज़िम्मेदार ठहराना चाहिए। जिस तत्पर्ता से ये एक्टिविस्ट इन आवारा कुत्तों के अधिकारों के लिए नागरिकों से उलझ जाते हैं उसी तत्पर्ता से इन्हें नागरिकों की सुरक्षा व अधिकार को भी ध्यान में रखना चाहिए।