शुक्रवार, 26 मई 2023

क्या पंजाब के ‘टीचिंग फेलो’ घोटाले में बड़ी मछलियां पकड़ी जाएँगी?


जब भी कोई बड़ा घोटाला सामने आता है तो आम जनता को इस बात का भरोसा नहीं होता कि घोटाले में लिप्त बड़ी मछलियाँ क़ानून के शिकंजे में क़ैद हो पायेंगी। इस बात के सैंकड़ों उदाहरण आपको बड़ी आसानी से मिल जाएँगे। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि प्राथमिक जाँच क्रेन वाले अधिकारी ही जाँच का रुख़ ग़लत दिशा में मोड़ देते हैं। नतीजतन घोटाले में लिप्त केवल छोटों मछलियों को ही सज़ा मिलती है और बड़ी मछलियाँ निडर हो कर खुलेआम घूमती हैं। ऐसा ही कुछ हुआ 2007 के पंजाब के ‘टीचिंग फेलो’ भर्ती घोटाले में।    

 ‘टीचिंग फेलो’ घोटाला पिछले कई दिनों से पंजाब में चर्चा में है। कारण है, इस घोटाले में पंजाब विजिलेंस विभाग द्वारा कार्यवाही करना। विजिलेंस विभाग ने ‘टीचिंग फेलो’ घोटाले में लिप्त शिक्षा विभाग के 5 कर्मचारियों को रिमांड पर लेने के बाद जेल भेज दिया। ग़ौरतलब है कि कि चार साल पहले शुरू हुई विजिलेंस की जांच टीम आज तक मामले के रिकॉर्ड जुटाने में ही अटकी हुई थी। यदि टीचिंग फैलोशिप भर्ती प्रक्रिया का रिकॉर्ड तैयार करने में शुरू से ही पारदर्शिता बरती गई होती तो भर्ती प्रक्रिया में शामिल हर अधिकारी और कर्मचारी के साथ-साथ भर्ती किए गए हर शिक्षक का पूरा रिकॉर्ड और ब्योरा विजिलेंस ब्यूरो के पास होता। परंतु  कड़वा सच यह है कि इस मामले की शुरुआत से, यानी 2007 से ही घोटाले के सूत्रधारों द्वारा ऐसी कोशिशें शुरू कर दी गई थी कि भविष्य में अगर कोई जांच हो तो इस घोटाले की कड़ियाँ आसानी से न जुड़ सकें


इस घोटाले के दस्तावेज़ों से यह पता चलता है कि मामले की शुरुआत में ही निदेशक शिक्षा विभाग (एलिमेंट्री) द्वारा जारी निर्देशों के तहत 18 जनवरी 2008 को विभिन्न जिलों के शिक्षा अधिकारियों (प्रारंभिक) को ‘टीचिंग फेलो’ की चयन समितियों के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था। इसके बाद पंजाब के शिक्षा विभाग के निदेशक द्वारा जिला शिक्षा अधिकारियों को चयन समितियों के गठन का जिम्मा सौंपा। सूत्रों के अनुसार विभिन्न जिलों में गठित चयन समितियों के सभी सदस्यों के नाम शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों द्वारा ही भेजे गए थे। विभिन्न जिलों में चयन समिति के सदस्यों की संख्या अलग-अलग थी। शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अलावा उपायुक्त कार्यालय से संबंधित प्रथम श्रेणी के अधिकारी, जिला सैन्य कल्याण बोर्ड से संबंधित अधिकारी या उनके प्रतिनिधि, जिला कल्याण बोर्ड का कोई प्रतिनिधि या अधिकारी और जिला खेलकूद विभाग का कोई प्रतिनिधि या अधिकारी भी चयन समिति के सदस्य के रूप में भर्ती प्रक्रिया की निगरानी और चुनावी प्रक्रिया में धोखाधड़ी की गुंजाइश को रोकने के लिए नियुक्त किया गया था।


आवेदकों के चयन एवं पात्रता की जांच के लिए पंजाब शिक्षा विभाग द्वारा चयन समिति के अलावा प्रति हजार आवेदकों पर दो मूल्यांकनकर्ता एवं दो चेकर भी नियुक्त किये गये थे। जिनका कार्य प्रतिदिन कम से कम एक सौ आवेदन पत्र एवं आवेदकों द्वारा दिये गये प्रमाण पत्रों की जांच करना था। यह ‘टीचिंग फेलो’ के आवेदनकर्ताओं की योग्यता सुनिश्चित करने के लिए था। लेकिन यदि इन मूल्यांकनकर्ताओं और चेकर्स ने अपना काम ईमानदारी से किया होता तो फर्जी प्रमाण-पत्रों के आधार पर नौकरी पाने की कोई गुंजाइश न होती। उम्मीद है कि अब तक चयन समिति में नियुक्त शिक्षा विभाग के कर्मचारियों, मूल्यांकनकर्ताओं, चेकर्स और विभाग के बाहर नियुक्त अधिकारियों का विवरण विजिलेंस ब्यूरो द्वारा प्राप्त हो गया होगा। लेकिन यह विवरण विजिलेंस द्वारा अपनी जांच को आगे बढ़ाने के लिए एक कदम तो हो सकता है परंतु मंजिल नहीं। क्योंकि इस भर्ती प्रक्रिया में जिस तरह से नियमों की अनदेखी की गई है उससे साफ है कि मामले में बड़ी मछलियों की संलिप्तता और भागीदारी ज्यादा अहमियत रखती है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि निचले स्तर के अधिकारियों ने इस मामले में फायदा नहीं उठाया। परंतु इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि निचले स्तर के अधिकारियों ने उच्च स्तर के अधिकारियों के दबाव में काम न किया हो।


‘टीचिंग फेलो’ की भर्ती प्रक्रिया के संबंध में तत्कालीन राज्यपाल द्वारा 16 जनवरी 2008 को दिए गए लिखित आदेशों की प्रथम पंक्ति में यह बात स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि भर्ती प्रक्रिया के कोऑर्डिनेटर शिक्षा विभाग के निदेशक होंगे। भर्ती प्रक्रिया की पूर्ण जिम्मेदारी भी उन्हीं की होगी। इसी आदेश में भर्ती प्रक्रिया के लिए नियुक्त चयन समितियों के संबंध में निर्देश भी दिए गए जिसमें मूल्यांकनकर्ता का काम उम्मीदवारों की योग्यता और प्रमाण पत्रों का मूल्यांकन करना होगा। चेकर्स का काम इन प्रमाणपत्रों की जांच करना होगा। अगर मूल्यांकनकर्ताओं और चेकर्स यानी जांचकर्ताओं ने अपना काम ईमानदारी से किया होता तो टीचिंग फेलोज भर्ती घोटाला सामने नहीं आता क्योंकि प्रत्येक आवेदक के प्रमाण पत्रों की जांच तभी कर ली गई होती।

भर्ती किये गये सभी चयनित टीचिंग फेलोज और प्रतीक्षा सूची के अभ्यर्थियों का विवरण एक वेबसाइट पर प्रकाशित करने के निर्देश भी दिये गये थे, लेकिन यह वेबसाइट बनाई ही नहीं गई। यदि ऐसी वेबसाइट बनाई गई होती तो सतर्कता ब्यूरो को पात्र और कुपात्र उम्मीदवारों का विवरण एकत्रित करने में कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। साफ है कि शिक्षक भर्ती घोटाले में नीचे से ऊपर तक नियमों का उल्लंघन किया गया है। इस पुराने घोटाले में अगर विजिलेंस अब भी सिर्फ रिकॉर्ड जुटाने में लगा रहेगा तो कुछ हाथ नहीं आएगा। घोटाले की जड़ तक पहुंचने के लिए विजिलेंस को इस घोटाले की बारीकियों पर भी गौर करना होगा, जिससे विजिलेंस ब्यूरो घोटाले में शामिल बड़ी मछलियों तक पहुंच सके।     

शुक्रवार, 19 मई 2023

क्या आपके पास मेडिक्लेम है?


जब भी कभी किसी को अस्पताल में महँगे इलाज, दुर्घटना या विशेष ट्रीटमेंट के लिए जाना पड़ता है तो अस्पताल में पंजीकरण करते समय ही आपसे पूछ लिया जाता है ‘क्या आपके पास मेडिक्लेम है?’। यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब हाँ में देने से कई लोग गर्व महसूस करते हैं। करें भी क्यों नहीं, आख़िर वो बीमा कंपनियों को नियमित रूप से स्वास्थ्य बीमा का प्रीमियम जो देते हैं। बीमा धारक को कंपनी के किए हुए वायदों पर विश्वास होता है तभी तो वो निःसंकोच बड़े से बड़े अस्पताल में इलाज के लिए चले जाते हैं। इस उम्मीद से कि बीमा कंपनी उनके इलाज का खर्च उठा लेगी। परंतु ज़्यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता। 
 
स्वास्थ्य सेवा के नाम पर हर सरकार बड़े-बड़े दावे ज़रूर करती है परंतु ज़मीनी हक़ीक़त इससे काफ़ी अलग है। आज के माहौल में यदि कोई भी व्यक्ति किसी बड़े अस्पताल में भर्ती होता है तो उसे इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं होता कि महँगे अस्पतालों में सेवा भाव बचा ही नहीं। वो तो सिर्फ़ मरीज़ की जेब पर ध्यान देते हैं। यदि मरीज़ थोड़ा सा जागरूक है या संपर्क वाला है तो उसे अस्पताल से कम चूना लगेगा, लेकिन चूना लगेगा ज़रूर। क्योंकि अस्पताल में भर्ती होना एक मजबूरी है और मजबूरी का फ़ायदा उठाना इन बड़े अस्पतालों को बखूबी आता है। मिसाल के तौर पर यदि आपके सीने में जलन या घबराहट जैसी स्थित उत्पन्न होती है और आप किसी भी नामी अस्पताल में चले जाते हैं तो वहाँ पर बिना देर किए आपको प्राथमिक चिकित्सा तो ज़रूर दी जाती है। उसके साथ ही कई ऐसे फ़ालतू के टेस्ट आदि भी किए जाते हैं जिनकी ज़रूरत बिलकुल भी नहीं होती।  ऐसा केवल अस्पताल का बिल बढ़ाने की दृष्टि से ही किया जाता है। 
 

यदि मरीज़ के पास किसी भी तरह का स्वास्थ्य बीमा या मेडिक्लेम है तो आपको भर्ती होने के लिए दबाव डाला जाता है। केवल इसी दृष्टि से कि बिना भर्ती हुए आप मेडिक्लेम की कैशलेस सुविधा का फ़ायदा नहीं उठा पाएँगे। कैशलेस यानी कि मुफ़्त का इलाज। मुफ़्त के इलाज के लालच में मरीज़ और उसके तीमारदार भी अस्पताल के झाँसे में आ जाते हैं और बिना पढ़े कई सारे काग़ज़ों पर हस्ताक्षर भी कर देते हैं। फिर क्या, अस्पताल आपके साथ  राजाओं की तरह का व्यवहार करता है। इस दिखावट की आड़ में अस्पताल ऐसे तमाम टेस्ट और जाँच शुरू कर देता है जिनकी इलाज की दृष्टि से ज़रा भी आवश्यकता नहीं होती। ऐसा केवल बीमा कंपनी को एक मोटा बिल भेजने की मंशा से किया जाता है। 
 

यहाँ आपके साथ एक क़िस्सा साझा करना सही होगा। एक किसान को खेतों में काम करते समय उसके हाथ पर चोट आई। परिवार वाले उसे नज़दीकी अस्पताल में ले गये। जिस अस्पताल में उस किसान को ले जाया गया वो एक नामी अस्पताल था। प्राथमिक उपचार करते समय वहाँ के डॉक्टर ने बातों-बातों में उससे पूछ लिया कि क्या आपके पास मेडिक्लेम है? जैसे ही किसान ने हाँ कहा तो डॉक्टर ने उसके हाथ पर टाँके लगाते हुए कहा कि खून काफ़ी बह गया है और आपकी कुछ और जाँच भी की जाएँगी। इसके लिए आपको यहाँ भर्ती होना पड़ेगा। चूँकि आपके पास मेडिक्लेम है इसलिए आपकी जेब से कुछ नहीं जाएगा। हम जाँच कर संतुष्ट होने के बाद ही आपको घर भेजेंगे। मरीज़ और उसके रिश्तेदारों को लगा कि जब अस्पताल आए ही हैं तो जाँच कराने में क्या परहेज़। इसलिए वे राज़ी हो गए। कई जाँच होने के बाद जब किसान का बिल ज़्यादा नहीं बढ़ा तो डाक्टरों ने ये तय किया कि जहां पर चोट आई है वहाँ की प्लास्टिक सर्जरी की जाए। किसी न किसी तरह किसान को राज़ी किया गया और एक साधारण सी चोट के लिए बड़ा सा ऑपरेशन कर डाला। जब बिल की रक़म काफ़ी मोटी हो गई तो उसे बीमा कंपनी के पास भेजा गया, जिसे कंपनी ने पास करने से मना कर दिया। 
 
ऐसे कई क़िस्से आपको मिल जाएँगे जहां अस्पतालों ने बीमा कंपनियों को ठगने की नियत से मोटे-मोटे बिल बना डाले। जब बिल पास नहीं हुए तो मरीज़ों पर भुगतान का दबाव डाला गया। मरीज़ों को मजबूरन बिल का भुगतान करने के लिए अपनी ज़मीन जायदाद बेचनी पड़ी। इससे बीमा धारकों का बीमा कंपनी से विश्वास उठने लगा। जबकि गलती अस्पतालों की है। 
 

जब तक देश में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तय मापदंड नहीं बनेंगे और उन्हें सख़्ती से लागू नहीं किया जाएगा तब-तब ऐसा होता रहेगा। सरकार को चाहिए कि हर इलाज के लिए मापदंडों को तय किया जाए और देश भर के सभी अस्पतालों में इलाज के मापदंड और उनकी दरों को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाए। इससे अज्ञानी मरीज़ों व उनके रिश्तेदारों को सभी तय नियम और मापदंड के बारे में पता रहेगा और साथ ही उनको इलाज के लिए कितना पैसा देना होगा उसकी भी जानकारी मिल सकेगी। यदि ऐसा होता है तो कभी भी कोई अस्पताल किसी की छोटी सी चोट के लिये प्लास्टिक सर्जरी करने की जुर्रत नहीं करेगा। इससे बीमा कंपनी की ठगी भी कम होगी, स्वास्थ्य सेवाएँ भी बेहतर होंगी और करदाता के पैसे की लूट भी बचेगी।

शुक्रवार, 12 मई 2023

बेलगाम ई रिक्शाओं का देश भर में आतंक


पर्यावरण को बचाने की दृष्टि से दुनिया भर में वैकल्पिक ईंधन के कई स्रोतों में से एक है इलेक्ट्रॉनिक वाहन। आजकल इन ई-वाहनों की संख्या काफ़ी बढ़ रही है और कई नामी कम्पनियाँ भी इस दौड़ में आ चुकी हैं। इसी श्रृंखला में देश भर में ई-रिक्शाओं का चलन भी काफ़ी तेज़ी से हो रहा है। जहां एक ओर ये ई-रिक्शा पर्यावरण को बचाने का काम कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर इनका आतंक भी काफ़ी बढ़ रहा है। देश भर के कई शहरों में अवैध रूप से चलने वाले ई-रिक्शा यातायात व्यवस्था के लिए एक अभिशाप बने हुए हैं।

आज आप देश के किसी भी शहर में चले जाएँ वहाँ आपको बेलगाम दौड़ रही ई-रिक्शा के चलते अव्यवस्था के साथ ट्रैफ़िक जाम जैसी बड़ी परेशानी को झेलना पड़ता है। इसके मुख्य कारणों में से कुछ कारण ऐसे हैं जो किसी भी शहर में आप देख सकते हैं। अपने हिसाब से रूट बनाकर दौड़ रहे ये ई-रिक्शा चालक शहर की गलियों तक में जाम को बड़ा रूप दे देते है। इसके अलावा बाजारों में मनमाने ढंग से रिक्शाओं को रोककर खड़े रहना। एक ही रूट पर अधिक यात्रियों के लालच में काफ़ी देर तक सड़कों पर खड़े रहना और जाम लगाना। ग़लत लेन में रिक्शाओं को चला कर अन्य वाहनों को न निकलने देना। ये कुछ ऐसे कारण हैं जो शहरों में जाम की बड़ी  परेशानी की वजह बनी हुई हैं।


ई-रिक्शाओं पर यातायात पुलिस की लगाम भी ढीली है, जिस कारण अवैध ई-रिक्शाओं की दौड़ भी बढ़ती जा रही है। यदि किसी शहर में यदि एक हज़ार ई-रिक्शाओं का पंजीकरण निर्धारित किया जाता है तो आपको सड़कों पर उससे कई गुना ज़्यादा तादाद में ई-रिक्शाओं का जाल नज़र आ जाएगा। परंतु ट्रैफिक विभाग या नगर निगम के अधिकारियों को ये अवैध ई-रिक्शा नज़र नहीं आएँगे। यदि कभी इन पर सख़्ती की भी जाती है तो वह केवल औपचारिकता के सिवाय कुछ नहीं होती।

दिल्ली जैसे महानगर को ही लें तो यहाँ की किसी भी प्रमुख सड़क पर, जहां ई-रिक्शाओं को चलाए जाने की अनुमति दी गई है, आपको जाम के नज़ारे दिखाई देंगे। मेट्रो स्टेशन हो या कोई भी प्रमुख बाज़ार, ई-रिक्शाओं का आतंक किसी माफिया से कम नहीं है। दिल्ली की मुख्य मेन रोड पर प्रायः ये ई-रिक्शा वाले दो से तीन लेन को ब्लॉक कर देते हैं और मजबूरन बसों व अन्य भारी वाहनों को भी अपनी निर्धारित लेन बदल कर सड़क के बीचों बीच चलना पड़ता है। नतीजतन जाम की स्थित बन जाती है। इस जाम के चलते प्रदूषण भी बढ़ जाता है। फिर वो चाहे अन्य वाहनों से निकालने वाले धुएँ के कारण वायु प्रदूषण हो या ध्वनि प्रदूषण, दोनों ही तकलीफ़ देते हैं। तो जिस पर्यावरण को बचाने की मंशा से ई-रिक्शाओं का चलन शुरू हुआ था वो उद्देश्य तो पूरा होता नहीं दिखाई देता।


ज़्यादातर ई-रिक्शा आपको मेट्रो स्टेशन व बस स्टॉप पर दिखाई देंगे। सवारियों को उनके गंतव्य तक पहुँचाने के लिए ई-रिक्शाओं व ऑटो सहायक पाए जाते हैं। परंतु यदि ये ई-रिक्शा व ऑटो अगर अनियंत्रित रूप से चलने लगेंगे और अपनी मनमानी करेंगे तो जनता को फ़ायदा नहीं नुक़सान ही होगा। प्रायः यह देखा गया है कि ज़्यादातर ई-रिक्शा सवारियों की खोज में बस स्टॉप को घेर कर खड़े रहते हैं। इस कारण बसों को उनके निर्धारित स्टॉप पर रुकने की जगह नहीं मिलती है। यदि किसी बस में से उस स्टॉप पर कोई उतरने वाली सवारी नहीं होती तो बस चालक अपनी बस को उस स्टॉप पर नहीं रोकता। परंतु उस बस स्टॉप से यदि कोई चढ़ने वाली सवारी होती है और यदि वो बस स्टॉप के अंदर प्रतीक्षा कर रही हो तो वो ई-रिक्शाओं के खड़े होने के कारण बस ड्राइवर को दिखाई नहीं देती। इसलिए जहां-जहां ये ई-रिक्शा बस स्टॉप को अवैध रूप से घेर कर खड़े रहते हैं वहाँ-वहाँ सवारियों को मजबूरन सड़क पर खड़ा होना पड़ता है। ऐसे में दुर्घटना और छीना-झपटी होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। परंतु कोई भी अधिकारी, चाहे पुलिस विभाग का हो या नगर निगम का, कोई कार्यवाही नहीं करता। कारण स्पष्ट है, ई-रिक्शाओं का जाल चलाने वाले गैंग हर विभाग के अधिकारियों को ‘खुश’ रखते हैं।         


देश भर में जिन-जिन शहरों ऐसे मार्ग या प्रमुख सड़कें हैं, जहां ये ई-रिक्शा जाम का कारण बनते हैं, वहाँ पुलिस प्रशासन व नगर निगम को सख़्ती से पेश आना चाहिए। यदि वहाँ पर अवैध रूप से ई-रिक्शा चल रहे हैं तो इनको ज़ब्त किया जाना चाहिए। यदि कोई भी ई-रिक्शा चालक ग़लत लेन में खड़ा है तो उसका चालान काटना चाहिए। ऐसा यदि समय-समय पर होता रहे तो ई-रिक्शा व ऑटो चलाने वाले गलती करने से बचेंगे। यदि उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा चालान में चला जाएगा तो कौन ऐसी गलती दोबारा करेगा। जहां पर अधिक ई-रिक्शा खड़े नहीं हो सकते वहाँ पर किसी ख़ाली सड़क पर या मैदान में ई-रिक्शा का स्टैंड बनाया जाए जहां चार्जिंग के साथ-साथ अन्य सुविधाएँ भी हों। जैसे ही ई-रिक्शा की माँग हो वैसे ही उन्हें सड़क पर, मेट्रो स्टेशन  या बस स्टॉप पर आने दिया जाए।

ऐसा नहीं है कि पुलिस अधिकारी यातायात को नियंत्रित नहीं कर सकते। यदि किसी भी इलाक़े में किसी वीआईपी का जाना तय होता है तो वहाँ पर यातायात पूरी तरह से व्यवस्थित और नियंत्रित रहता है। यह वही मार्ग होते हैं जहां सामान्य दिनों में आपको भारी जाम का सामना करना पड़ता है। परंतु यदि कोई वीआईपी उस मार्ग से गुज़र रहा हो तो कुछ पल के लिए ही सही वह सड़क भी साँस लेने लगती है और उस पर चलने वाले वाहन भी चैन की साँस लेते हैं। इसलिए समय-समय पर यातायात पुलिस और नगर निगम विभाग के अधिकारियों की संयुक्त कार्यवाही होती रहनी चाहिए जिससे कि देश की जनता को भी ये लगे कि वो भी किसी वीआईपी से कम नहीं और उन्हें भी ई-रिक्शा व अन्य अवैध वाहनों के चलते जाम का सामना नहीं करना पड़ेगा।

शुक्रवार, 5 मई 2023

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्री योगी का शंखनाद


बीते हफ़्ते देश भर में उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फ़ोर्स (एसटीएफ़) खूब चर्चा में थी। कारण था यूपी एसटीएफ़ द्वारा एक प्रभावशाली व्यक्ति को गिरफ़्तार किया जाना। सत्ता के गलियारों में, ख़ासकर दिल्ली में, किसी ने भी इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि एक ऐसा व्यक्ति जो ख़ुद को देश के शीर्ष नेतृत्व के काफ़ी निकट बताता रहा हो उसे एक मामूली ठग की तरह ऊप्र की पुलिस गिरफ़्तार कर लेगी। इस गिरफ़्तारी से एक सीधा संदेश गया है, योगी राज में भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं है।  
 
संजय राय नामक ये व्यक्ति पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के शेरपुर गांव का रहने वाला है। दिल्ली के गलियारों में ये संजय शेरपुरिया के नाम से मशहूर है। ख़ुद को सत्तारूढ़ दल के शीर्ष नेताओं का करीबी बताने वाला शेरपुरिया, किसी भी काम को चुटकियों में करवाने का दावा करता था। लोगों को विश्वास दिलाने की नीयत से शेरपुरिया ने हर महत्वपूर्ण व्यक्ति के साथ अपनी तमाम तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी डाल रखी थी। जिस विश्वास के साथ वो अपने ‘शिकारों’ के साथ अपने दिल्ली स्थित आवास में मीटिंग करता था, उससे तो कोई भी उसके झाँसे में बड़े आराम से आ जाता। क्योंकि उसका आवास प्रधान मंत्री के आवास के बेहद नज़दीक था। इतना ही नहीं उसके घर पर चलने वाले इंटरनेट के वाईफ़ाई का नाम भी ‘पीएमओ’ था। जिसका बखान वो अपने मेहमानों के सामने बड़े ज़ोर शोर से करता था।  
 

एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार शेरपुरिया की संस्था में देश के कई बड़े आईएएस, आईपीएस अधिकारी व फ़ौज के कुछ अफ़सर भी हैं। ये सभी व्यक्ति अपनी सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद इस संस्था के सलाहकार बने हुए थे। आश्चर्य की बात यह है कि कोई व्यक्ति इतने बड़े पैमाने पर ठगी कर रहा था और देश की राजधानी में शीर्ष जाँच एजेंसियाँ और ख़ुफ़िया तंत्र इन सबसे बेख़बर था। इसकी जानकारी जैसे ही ऊप्र की एसटीएफ़ को लगी तो उन्होंने तुरंत कार्यवाही की। इस कार्यवाही के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ बधाई के पात्र हैं जिन्होंने बिना विलंब इस ठग पर कार्यवाही करवाई। 
 
दरअसल मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने इससे पहले भी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाया है। आपको याद होगा कि आज से एक साल पहले मुख्य मंत्री ने उत्तर प्रदेश के सभी अफ़सर, मंत्री व विधायकों को तीन महीने के अंदर अपनी चल-अचल सभी सम्पत्तियों की घोषणा सार्वजनिक करने के आदेश दिए थे। उनके इस आदेश से काफ़ी हड़कंप मच गया था। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जब भी कोई नेता आवाज़ उठाता है तो उसकी लोकप्रियता ऊपर उठने लगती है। जानता के बीच भी एक सकारात्मक संदेश जाता है। जिस तरह योगी आदित्यनाथ अपनी ‘बुलडोज़र’ नीति के लिए जाने जाते हैं, उनके इस कदम से तमाम भ्रष्ट लोगों का भयभीत होना निश्चित ही है। इसीलिए शेरपुरिया जैसे व्यक्ति पर कार्यवाही होना योगी आदित्यनाथ के व्यक्तित्व को और मज़बूती देगा। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी योगी जी को प्रोत्साहित करना चाहिए।
 
परंतु योगी जी को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि उनके इर्द गिर्द की नौकरशाही ही उनके इस शंखनाद  का पलीता न लगा दें। दिल्ली के कालचक्र समाचार ब्यूरो ने उत्तर प्रदेश सरकार के एक वीआईपी पाइलट कैप्टन प्रज्ञेश मिश्रा के भारी भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया था। इस पाइलट के परिवार की 200 से ज़्यादा ‘शैल कम्पनियों’ में हज़ारों करोड़ रुपया घूम रहा है। जिसे कालचक्र ने सप्रमाण उजागर किया था। कालचक्र की शिकायत पर ही प्रवर्तन निदेशालय ने प्रज्ञेश मिश्रा के ख़िलाफ़ जाँच करने का नोटिस उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को 19 मई 2020 को जारी किया था। आश्चर्य है कि तब से अब तक इसकी जाँच नहीं हुई। 
 
कालचक्र ने उत्तर प्रदेश की महामहिम राज्यपाल आनंदी बेन पटेल को भी इसकी जाँच न होने की लिखित शिकायत अप्रैल 2021 में भेजी। राज्यपाल महोदया ने तुरंत 31 मई 2021 को उत्तर प्रदेश शासन को इस जाँच को करने के निदेश दिए। पर उस जाँच का क्या हुआ, आज तक नहीं पता चला।  
 
कैप्टन प्रज्ञेश मिश्रा व उनके परिवार की ‘शैल कम्पनियों’ की कई सूचियाँ भी योगी जी के कार्यालय को भेजीं परंतु जाँच में कोई प्रगति नहीं हुई। उधर उत्तर प्रदेश शासन ने अपनी तरफ़ से आश्वस्त होने के लिए या शिकायतकर्ता का नैतिक बल परखने के लिए, उनसे शपथ पत्र भी लिया कि वे अपनी शिकायत पर क़ायम हैं और पूरी ज़िम्मेदारी से ये मामला जनहित में उठा रहे हैं। इसके बाद भी जाँच क्यों नहीं हुई ये चिंता का विषय है। अगर शेरपुरिया की तरह इन कम्पनियों में घूम रहे हज़ारों करोड़ रुपए का स्रोत कैप्टन प्रज्ञेश मिश्र या उनके परिवारजनों से कड़ाई से पूछा गया होता तो अब तक प्रदेश के कितने ही बड़े अफ़सर और नेता बेनक़ाब हो चुके होते। इसीलिए शायद उन्होंने इस जाँच को आज तक आगे नहीं बढ़ने दिया और योगी जी को लगातार धोखे में रखा। 
 
अब योगी जी को इस जाँच का बुलडोज़र भी शेरपुरिया की तर्ज़ पर तेज़ी से चलाना चाहिए। इस से उनकी छवि तो बनेगी ही, भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके इस शंखनाद की ईमानदारी भी सिद्ध होगी। क्योंकि किसी मुख्यमंत्री के एक साधारण से पाइलट को कुछ लाख रुपए का ही वेतन मिलता है। उस पर इतनी अकूत दौलत कहाँ से आ गयी, ये योगी जी के लिए गहरी चिंता का कारण होना चाहिए। वहीं गुजरात की बात करें तो ऐसे ही एक पायलट अजय चौहान को हाल ही में गुजरात सरकार ने नौकरी से हटाया और उसके ख़िलाफ़ जाँच के आदेश भी दिये। वहीं कैप्टन प्रज्ञेश मिश्रा के विरुद्ध ईमानदारी से जाँच का मतलब उत्तर प्रदेश शासन में बीस वर्षों से व्याप्त भारी भ्रष्टाचार के क़िले का ढहना होगा। अब देखना यह है कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हिम्मत से छेड़ी इस मुहीम को योगी जी कितनी तेज़ी से आगे बढ़ाते हैं?