शुक्रवार, 8 मई 2026

विपक्ष को गंभीर चिंतन की जरूरत !

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम और केरल के विधानसभा चुनाव परिणामों पर हर टीवी चैनल पर चुनावी पंडित और राजनैतिक वुशेषज्ञ गहन टिप्पणी कर रहे हैं। कुल मिलाकर इन विशेषज्ञों ने इन नतीजों को महज साधारण चुनावी उलटफेर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की दिशा में एक बड़े बदलाव के रूप में चित्रित किया। चुनाव विश्लेषक एक ओर इसे ‘बंगाल की विजय’ मानते हैं और दूसरी ओर विपक्षी दलों के लिए ‘गंभीर आत्मचिंतन का क्षण’ मानते हैं। नतीजों से यह बात तो स्पष्ट है कि परिणाम केवल मतदाता रुझान नहीं, बल्कि प्रक्रियागत सवालों और विपक्ष की रणनीतिक कमजोरियों का मिश्रण हैं। लेकिन विपक्ष के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि भविष्य के चुनावों के लिए उन्हें कुछ नया सोचना होगा और बेहतर रणनीति बनानी पड़ेगी।
 

पश्चिम बंगाल की बात करें तो बीजेपी के वोट शेयर में मात्र 3 प्रतिशत की बढ़त के साथ काफ़ी मात्रा में सीटें जीती। लेकिन तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि राज्यव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया में लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए, जिनमें अधिकांश मुस्लिम और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पारंपरिक वोटर थे। यदि ये 4.3 प्रतिशत मतदाता वोट डाल पाते तो शायद नतीजा अलग होता। कुछ चुनवी विश्लेषक इसे ‘क्यूरेटेड चुनाव’ कहते हैं। यानी परिणाम पहले से तय करने वाली प्रक्रिया। इसी तरह असम में भी बीजेपी की बड़ी जीत को चुनावी विश्लेषक सीमा-समस्या, ध्रुवीकरण और मतदाता सूची संशोधन से जोड़ कर देख रहे हैं।
 

यदि तमिलनाडु की बात करें तो टीवीके की सफलता को सकारात्मक विकास माना जाए। डीएमके की सत्ता-विरोधी लहर और स्टालिन की अपनी सीट हारने जैसी घटना ने साबित किया कि पुरानी पार्टियां जनता से दूर हो चुकी हैं। टीवीके की जीत नए चेहरे, युवा अपील और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रतीक है। वहीं केरल में कांग्रेस-नेतृत्व वाले यूडीएफ की जीत ने विपक्षी खेमे को कुछ राहत दी, लेकिन कुछ जानकर ऐसा मानते हैं कि क्या यह राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के ‘टेम्प्लेट’ का हिस्सा बन सकता है, जहां मतदाता सूची प्रबंधन, ध्रुवीकरण और संगठनात्मक ताकत एक साथ काम करती हो?
 
गौरतलब है कि विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी और मतदाता सूची से नाम कटने के आरोप निश्चित रूप से जांच के योग्य हैं। चुनाव आयोग को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। लेकिन केवल प्रक्रियागत दोषों पर जोर देकर विपक्ष अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। बंगाल में टीएमसी की 15 साल की सत्ता में भ्रष्टाचार, हिंसा और विकास की अनदेखी ने जनता को बीजेपी की ओर धकेला। तमिलनाडु में डीएमके का परिवारवाद और प्रदर्शन की कमी ने टीवीके जैसे नए विकल्प को रास्ता दिया। असम और केरल के नतीजे भी साबित करते हैं कि स्थानीय मुद्दे, विकास और नेतृत्व की विश्वसनीयता निर्णायक हैं। ऐसे में विपक्ष के लिए यह ‘आत्मचिंतन का क्षण’ है, लेकिन विपक्ष को इसे केवल शिकायत में नहीं बदलना चाहिए।
 

विपक्षी दलों और इंडिया गठबंधन को भविष्य की रणनीति पर गंभीरता से काम करना होगा। पहला: आंतरिक सुधार- पुरानी पार्टियां परिवारवाद, सत्ता-केंद्रित संस्कृति और भ्रष्टाचार से ग्रस्त हैं। टीएमसी और डीएमके को युवा, नए चेहरों और स्थानीय मुद्दों पर आधारित नेतृत्व विकसित करना चाहिए, जैसा टीवीके ने किया। कांग्रेस को अपने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना होगा, न कि केवल गठबंधनों पर निर्भर रहना। विपक्ष को ‘सिर्फ बीजेपी-विरोध’ की राजनीति छोड़कर सकारात्मक एजेंडे पर काम करना चाहिए, जैसे कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान कल्याण और क्षेत्रीय अस्मिता।
 

दूसरा: चुनावी प्रक्रिया की निगरानी और सुधार - विपक्ष को विशेष गहन पुनरीक्षण के मुद्दे को राष्ट्रीय आंदोलन बनाना चाहिए। पारदर्शी मतदाता सूची, वीवीपीएटी की पूरी जांच, डिजिटल निगरानी और चुनाव आयोग की स्वायत्तता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी जाए। लेकिन यह लड़ाई केवल अदालतों तक सीमित न रहे, जमीनी स्तर पर मतदाता जागरूकता अभियान चलाएं। मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के मतदाताओं को सूची में शामिल कराने के लिए विशेष ड्राइव चलाई जाए, ताकि भविष्य में कोई ‘क्यूरेटेड’ नतीजा न निकले।
 
तीसरा, गठबंधन और रणनीतिक एकता - इंडिया गठबंधन को बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सीट बंटवारे की बजाय विचारधारा आधारित साझेदारी पर जोर देना चाहिए। जहां टीवीके जैसी नई पार्टियां उभर रही हैं, वहां उन्हें सहयोगी बनाएं, न कि प्रतिद्वंद्वी। डिजिटल कैंपेनिंग, डेटा एनालिटिक्स और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके युवा वोटरों को जोड़ा जाए। विजय जैसे सेलिब्रिटी नेताओं की सफलता से सीखें, भावनात्मक जुड़ाव, साफ-सुथरी छवि और विकास-केंद्रित संदेश देना।
 
चौथा, क्षेत्रीय मुद्दों पर फोकस - राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी की ‘हिंदुत्व’ और विकास की दोहरी रणनीति का मुकाबला स्थानीय एजेंडे से करें। बंगाल में टीएमसी को हिंसा-मुक्त प्रशासन और औद्योगिक विकास का वादा करना चाहिए। तमिलनाडु में डीएमके को डीएमके-विरोधी लहर को ‘क्षेत्रीय गौरव’ में बदलना होगा। विपक्ष को महिला, युवा और किसान योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर देना चाहिए, ताकि बीजेपी की कल्याण योजनाओं का मुकाबला किया जा सके।
 
पांचवां, लंबी अवधि की तैयारी- 2029 लोकसभा चुनाव को नजर में रखते हुए विपक्ष को अब से संगठनात्मक काम शुरू करना चाहिए। प्रत्येक बूथ स्तर पर कार्यकर्ता ट्रेनिंग, फीडबैक मैकेनिज्म और विरोधी दलों की कमजोरियों का विश्लेषण जरूरी है। उल्लेखनीय है कि यह राष्ट्रीय ‘टेम्प्लेट’ बन सकता है। इसलिए विपक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर ‘लोकतंत्र बचाओ’ अभियान चलाना चाहिए, जिसमें मीडिया, बुद्धिजीवी और नागरिक समाज शामिल हों।
 
चुनावी नतीजों के बाद आने वाली अधिकतर टीवी चर्चाएँ विपक्ष के लिए एक आईना है। इसमें हार के कारण दिखते हैं, लेकिन जीत का रास्ता भी। यदि विपक्ष केवल आरोप-प्रत्यारोप पर अटका रहा तो बीजेपी का ‘क्यूरेटेड’ मॉडल और मजबूत होगा। लेकिन आत्मचिंतन, सुधार, एकता और सकारात्मक एजेंडे के साथ विपक्ष न केवल अगले चुनाव जीत सकता है, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत भी कर सकता है। समय कम है। अब फैसला विपक्ष को करना है, या तो शिकायत करें या बदलाव लाएं।

*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं। 

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