शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान


हाल ही में देश भर से परेशान करने वाली कुछ ऐसी खबरें आई जिनका सामना हम सभी को अपने-अपने इलाक़े कभी न कभी करना पड़ा है। हमारे शहरों में आवारा कुत्तों की समस्या हर दिन बढ़ती जा रही है। आम जनता को हर गली मोहल्ले में आवारा कुत्तों से खुद को बचा कर निकलना पड़ता है। यदि इन कुत्तों से बचने के लिए हम इन्हें लाठी, डंडा या पत्थर का डर दिखाते हैं तो समाज के कुछ सभ्य लोग, जो खुद को पशु प्रेमी कहते हैं, इसका विरोध करते हैं। कुछ जगहों पर तो ये लोग नागरिकों को पुलिस की कार्यवाही की धमकी तक दे देते हैं। ग़नीमत है कि आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में कुछ सुझाव आम नागरिकों के हित में दिये हैं।



सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी की खंडपीठ ने ऐसे एक मामले की सुनवाई के समय कहा कि ‘लोगों की सुरक्षा और पशुओं के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।’ कोर्ट ने कहा कि हर गली मोहल्ले में आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले लोगों को ही उनका टीकाकरण कराने तथा यदि जानवर किसी पर हमला करे तो उसका खर्च वहन करने के लिए जिम्मेदार बनाया जा सकता है।आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के मुद्दे पर न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने कहा, 'हममें से ज्यादातर कुत्ता प्रेमी हैं। मैं भी कुत्तों को खाना खिलाता हूं। मेरे दिमाग में कुछ आया। लोगों को कुत्तों का ख्याल रखना चाहिए, लेकिन उन्हें चिह्नित किया जाना चाहिए, चिप के माध्यम से ट्रैक नहीं किया जाना चाहिए, मैं इसके पक्ष में नहीं हूं।’ मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। इस मामले में अंतिम आदेश क्या आता है ये तो आने वाला समय ही बताएगा। परंतु इस समस्या का बढ़ना देशवासियों के लिए ख़तरा बनता जा रहा है।

जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस जेके माहेश्वरी की पीठ ने 2016 में न्यायालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति से भी रिपोर्ट मांगी, जिसका नेतृत्व केरल हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस एस सिरिजगन ने केरल में आवारा कुत्ते के मुद्दे के संबंध में किया। सिरी जगन समिति ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट दाखिल की, जिसमें कहा गया कि अकेले पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) कार्यक्रम के कार्यान्वयन से केरल में आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान नहीं होगा। इस समस्या का कोई स्थाई हल निकालना होगा।

मामला केरल का हो, आगरा का हो, दिल्ली एनसीआर का हो या मुंबई का हो, देश भर से ऐसी खबरें आती हैं जहां कभी किसी बच्चे को, किसी डिलीवरी करने वाले को या किसी बुजुर्ग को इन आवारा पशुओं का शिकार होना पड़ता है। वहीं यदि कोई स्थानीय नगर निगम से इन कुत्तों की शिकायत करता है तो निगम द्वारा इन कुत्तों को पकड़ कर इनका टीकाकरण कर देता है जिससे इन कुत्तों की जनसंख्या पर रोक लगाया जा सकती है। टीका लगाने के पश्चात कुत्तों को वापिस उसी इलाक़े में छोड़ दिया जाता है जहां से उन्हें पकड़ा गया था। यानी कुत्तों की समस्या से छुटकारा नहीं मिलता। केवल उनके जन्म नियंत्रण पर ही रोक लगती है। उनके द्वारा काटे जाने पर रेबीज़ जैसी से बचने वाले टीके नहीं लगते।

इस सब के बावजूद आवारा कुत्तों में वृद्धि ही हो रही है। इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि या तो आवारा कुत्तों को सरकारी इंजेक्शन का कोई असर नहीं हो रहा और इनकी जनसंख्या बढ़ रही है। कोर्ट के आदेश की अनदेखी कर पकड़े गए आवारा कुत्तों को दूसरे इलाक़ों में छोड़ दिया जाता है।

इसलिए यह ज़रूरी है कि आवारा कुत्तों के हक़ के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्ट इस बात का ध्यान दें कि उनकी ज़िम्मेदारी केवल बेज़ुबान पशुओं के प्रति ही नहीं बल्कि समाज के प्रति भी है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के सुझाव का सम्मान करते हुए इन एक्टिविस्टों को अपने गली मोहल्ले में सभी आवारा पशुओं को चिन्हित कर उनका पंजीकरण करवाना चाहिए। उनका टीकाकरण करवाना चाहिए। यदि उन आवारा पशुओं द्वारा किसी व्यक्ति को काट लिया जाता है या उसकी संपत्ति को नुक़सान पहुँचाया जाता है तो उसकी भरपाई और इलाज के लिए इन एक्टिविस्टों को ही ज़िम्मेदार ठहराना चाहिए। जिस तत्पर्ता से ये एक्टिविस्ट इन आवारा कुत्तों के अधिकारों के लिए नागरिकों से उलझ जाते हैं उसी तत्पर्ता से इन्हें नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आवारा पशुओं के हक़ के लिए लड़ना चाहिए।

इसके साथ ही राज्य सरकारों और नगर निगमों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर गली मोहल्ले में आवारा पशुओं के साथ-साथ ‘एनिमल लवर्स’ का भी पंजीकरण अनिवार्य हो। हर ‘एनिमल लवर’ को केवल निर्धारित स्थानों पर ही आवारा पशुओं को खाना देने की अनुमति हो। नगर निगम  द्वारा ‘एनिमल लवर्स’ और आवारा कुत्तों की नियमित जाँच हो जिससे यदि किसी भी इलाक़े में आवारा पशु की वृद्धि होती है तो उस पर तुरंत कार्यवाही कर नियंत्रण पाया जा सके।

यह समस्या विदेशों में नहीं देखी जाती क्योंकि वहाँ पर नगर निगम के अधिकारी और जनता एक दूसरे पर भरोसा करते हैं और क़ानून का पालन भी करते हैं। हमारे देश में यह कब और कैसे होगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा। तब तक के लिए ‘एनिमल लवर्स’ और नागरिकों को संयम बनाए रखने की ज़रूरत है। बेज़ुबान जानवर तो वही करेंगे जैसा उनको समझाया जाएगा। बेज़ुबान जानवरों की रक्षा करते हुए हमें खुद जानवर नहीं बनना चाहिए।

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