दुनिया के चांदी बाज़ार में इस समय जो उथल‑पुथल दिख रही है, उसमें चीन की नीतियां निर्णायक भूमिका निभा रही हैं और यही स्थिति वैश्विक निवेशकों के लिए गंभीर चेतावनी बन गई है। यह केवल सामान्य उतार‑चढ़ाव नहीं, बल्कि आपूर्ति, स्टॉकपाइल और निर्यात नियंत्रण के ज़रिए कीमतों व भावनाओं को प्रभावित करने का जटिल खेल है। 2025 में चीन ने चांदी पर राज्य‑नियंत्रित निर्यात लाइसेंसिंग सिस्टम लागू किया, यानी बिना सरकारी मंज़ूरी के कोई कंपनी चांदी बाहर नहीं भेज सकती। शुरुआत में यह कदम “घरेलू उद्योग की सुरक्षा” और “संसाधन‑संरक्षण” के नाम पर उठाया गया, लेकिन इसका तात्कालिक असर वैश्विक बाज़ार में आपूर्ति‑संकट और तेज़ी से बढ़ती कीमतों के रूप में दिखा।
इसी साल अक्टूबर में चीन ने अचानक रिकॉर्ड 660 टन चांदी एक महीने में निर्यात कर दी, जो इतिहास में सबसे बड़ा मासिक आंकड़ा माना जा रहा है। यह कदम पहले लगाए गए निर्यात नियंत्रणों से उलट था और इसे एक घबराए हुए बाज़ार को शांत करने तथा वैश्विक कीमतों की दिशा तय करने की कोशिश के रूप में देखा गया।
शंघाई फ्यूचर्स एक्सचेंज के आंकड़े दिखाते हैं कि 2021 के आसपास लगभग 3,900–5,000 टन तक पहुंचा चीन का चांदी स्टॉक 2025 के अंत तक गिरकर लगभग 700–800 टन के आसपास ही रह गया। यानी 80–85 प्रतिशत तक की गिरावट। जब दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक खपत वाली अर्थव्यवस्था के गोदाम इस तरह खाली होने लगते हैं और साथ ही निर्यात नीति बार‑बार बदली जाती है, तो बाज़ार में “वास्तविक कमी” और “संचालित कमी” के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
अनुमान है कि 2024 में चीन ने लगभग 3,300 टन चांदी का उत्पादन किया, जबकि घरेलू खपत 19,000 टन के आसपास पहुंच गई, यानी लगभग 15,700 टन का वार्षिक घाटा। यह संरचनात्मक घाटा और घटते स्टॉकपाइल चीन को नीति के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों और सप्लाई‑चेन पर अतिरिक्त दबाव बनाने का मौका देता है।
यह पहली बार नहीं है जब चीन किसी महत्वपूर्ण खनिज या धातु की आपूर्ति को भू‑राजनीतिक (जियोपॉलिटिक्स) या आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया हो। दुर्लभ धातुओं में 2008–2010 के बीच चीन ने निर्यात पर कोटा और पाबंदियां लगाकर कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया और जापान के साथ विवाद के दौरान सप्लाई रोक कर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश की थी।
हाल के वर्षों में भी लिथियम, रेयर अर्थ और अन्य रणनीतिक खनिजों के बाज़ार में अचानक कोटा बदलाव, “मेंटेनेन्स” के नाम पर प्रोसेसिंग बंदी और स्टॉक से अचानक बड़े पैमाने पर माल छोड़ने जैसी नीतियों के ज़रिए 40–60 प्रतिशत तक कृत्रिम कीमत‑झटके पैदा करने के आरोप लगते रहे हैं। यह पैटर्न दिखाता है कि चीन संसाधनों पर अपनी पकड़ को केवल कारोबारी नहीं, बल्कि भू‑राजनीतिक शक्ति के रूप में देखता है।
कमोडिटी बाज़ारों में ‘कोर्नरिंग’ या ‘मैनिपुलेशन’ की कोशिशों का इतिहास बेहद कड़वा रहा है। 1979–80 में हंट ब्रदर्स ने भारी मात्रा में फ्यूचर्स और भौतिक चांदी खरीदकर दुनिया का एक‑तिहाई चांदी पर नियंत्रण करने की कोशिश की, जिससे कीमतें लगभग 6 डॉलर से बढ़कर 50 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गईं। जैसे ही नियामकों ने पोज़िशन लिमिट कड़ी की और मार्जिन बढ़ाए, बाज़ार ध्वस्त हुआ, ‘सिल्वर थर्सडे’ के नाम से मशहूर क्रैश में कुछ ही दिनों में कीमत आधे से भी कम पर आ गई और लाखों निवेशक बर्बाद हुए।
इसी तरह, दुर्लभ धातुओं के बाज़ार में चीन की 2010 की पाबंदियों ने वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को झटका दिया, उनकी लागत अचानक बढ़ गई और निवेश निर्णयों में भारी अनिश्चितता पैदा हुई। ये उदाहरण बताते हैं कि जब भी कोई सरकार या शक्तिशाली समूह किसी कमोडिटी को नियंत्रित करने की हद तक अपने हाथ में लेने लगता है, तो शुरुआती दौर में कीमतें ऊंची होकर ‘लाभ’ का भ्रम पैदा करती हैं, लेकिन अंततः परिणाम क्रैश और अव्यवस्था के रूप में सामने आते हैं।
आज की स्थिति में चांदी की कीमतों में तेज़ उछाल के पीछे दो समानांतर धाराएं काम कर रही हैं। एक तरफ वास्तविक औद्योगिक मांग, जैसे कि सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल उपकरण, जिसके लिए चांदी लगभग अपरिवर्तनीय है। दूसरी तरफ चीन सहित बड़े खिलाड़ियों की नीतिगत चालें, जैसे कि निर्यात पर रोक, अचानक बड़े निर्यात और कमोडिटी एक्सचेंजों पर ‘पेपर’ व ‘फिजिकल’ बाज़ार के बीच बढ़ती खाई। भ्रमित हो रहे निवेशकों के लिए इन दिनों सबसे बड़ा खतरा यह है कि चांदी की मौजूदा तेज़ी को बिना समझे ‘नई सामान्य स्थिति’ मान लिया जाए। कई विश्लेषण 80–100 प्रतिशत सालाना बढ़त और 90–170 डॉलर प्रति औंस के संभावित लक्ष्य जैसी बातों का ज़िक्र कर रहे हैं, लेकिन यह भी साफ चेतावनी देते हैं कि यह वित्तीय सलाह नहीं, बल्कि उच्च जोखिम वाले परिदृश्य हैं। ऐसे माहौल में भावनात्मक खरीद, लेवरेज्ड ट्रेडिंग और अफवाह आधारित निर्णय निवेशकों को एक बार फिर से ‘सिल्वर थर्सडे’ जैसी स्थितियों की ओर धकेल सकते हैं।
निवेशकों के लिए ज़रूरी है कि वे चीन की हर नीति‑घोषणा, निर्यात लाइसेंसिंग, टैक्स बदलाव, स्टॉक रिलीज़ आदि को केवल ‘समाचार’ नहीं, बल्कि बाज़ार‑रणनीति का हिस्सा समझें। किसी भी एक देश, एक एक्सचेंज या एक विश्लेषक के नैरेटिव पर अत्यधिक भरोसा करने के बजाय, विविध स्रोतों से आंकड़े, स्टॉक स्तर, इंडस्ट्रियल डिमांड और पॉलिसी‑रिस्क का आकलन करना आवश्यक है। सबक साफ है कि जब भी संसाधन और सत्ता एक ही हाथ में केंद्रित होते हैं, बाज़ार ‘फ्री’ नहीं रह जाते, वे ‘मैनेज्ड’ हो जाते हैं। चांदी की मौजूदा कहानी निवेशकों के लिए केवल मुनाफे का मौका नहीं, बल्कि यह समझने की कसौटी है कि भू‑राजनीति और कमोडिटी बाज़ार के बीच गठजोड़ कितना खतरनाक हो सकता है और इस खतरनाक गठजोड़ से बचाव की पहली और अहम शर्त केवल सावधानी ही है, अंध‑उत्साह नहीं।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

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