हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। जनवरी 2026 में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकारों को चेतावनी दी कि हर कुत्ते के काटने, मौत या चोट के लिए भारी मुआवजा तय किया जाएगा, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के मामलों में। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारें कुछ नहीं कर रही हैं और पिछले पांच सालों में पशु जन्म नियंत्रण नियमों का पालन नहीं हुआ। इसके अलावा, कुत्तों को भोजन देने वालों को भी जिम्मेदार ठहराया जाएगा। कोर्ट ने सुझाव दिया कि अगर कोई कुत्तों की देखभाल करना चाहता है, तो उन्हें अपने घर ले जाएं, न कि सड़कों पर छोड़कर लोगों को डराएं। कोर्ट ने स्कूलों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को हटाने और शेल्टर में रखने का आदेश दिया है, लेकिन उन्हें वापस उसी जगह न छोड़ने की हिदायत दी। यह सख्ती आवश्यक है क्योंकि कुत्तों के हमलों से हर साल हजारों लोग प्रभावित होते हैं और रेबीज जैसी घातक बीमारी फैलती है। कोर्ट का यह कदम मानव सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल अदालती हस्तक्षेप से समस्या हल हो जाएगी? नहीं, इसके लिए समाज, पशु प्रेमियों और कॉर्पोरेट जगत की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
पशु प्रेमी इस समस्या के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे आवारा कुत्तों की समस्या को खत्म करने के लिए शांतिपूर्ण वातावरण बनाने में मदद कर सकते हैं। सबसे पहले, जिम्मेदार फीडिंग अपनाएं। सड़कों पर भोजन फेंकने के बजाय, निर्धारित जगहों पर या अपने घरों में कुत्तों को रखकर ही खिलाएं। इससे कुत्ते आक्रामक नहीं बनेंगे और लोगों को डर नहीं लगेगा। दूसरा, एडॉप्शन को बढ़ावा दें। पशु प्रेमी आवारा कुत्तों को गोद लें, उन्हें घर दें और उनकी देखभाल करें। भारत में कई एनजीओ जैसे वीओएसडी और स्ट्रे एनिमल फाउंडेशन इंडिया इस काम में लगे हैं। पशु प्रेमी समुदाय बनाकर स्थानीय स्तर पर कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण अभियान चला सकते हैं। तीसरा, शिक्षा और जागरूकता फैलाएं। लोगों को बताएं कि आवारा कुत्तों को नियंत्रित करने से सभी का लाभ है। पशु प्रेमी सोशल मीडिया और कम्युनिटी ग्रुप्स के माध्यम से यह संदेश फैला सकते हैं कि पशु कल्याण मानव सुरक्षा से अलग नहीं है। यदि पशु प्रेमी इन कदमों को अपनाएं, तो आवारा कुत्तों की समस्या कम हो सकती है और यह सभी के लिए शांतिपूर्ण वातावरण बन सकता है।
अब सवाल है कि कॉर्पोरेट कंपनियां और पशु प्रेमी मिलकर आवारा कुत्तों का प्रबंधन कैसे करें ताकि नागरिकों को नुकसान न हो? कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के तहत कंपनियां बड़ा योगदान दे सकती हैं। वे एनजीओ के साथ साझेदारी करके शेल्टर बना सकती हैं, जो सरकारी डॉग शेल्टर से बेहतर बने, जहां आवारा कुत्तों को रखा जाए, उनकी नसबंदी और वैक्सीनेशन किया जाए। मसलन, दिल्ली जैसे शहर में 10 लाख आवारा कुत्तों को शेल्टर में रखने का खर्च करीब 700-800 करोड़ रुपये सालाना हो सकता है, लेकिन कॉर्पोरेट फंडिंग से यह संभव हो सकता है। पशु प्रेमी इन शेल्टर में वॉलंटियर के रूप में काम कर सकते हैं, कुत्तों की देखभाल कर सकते हैं और एडॉप्शन इवेंट आयोजित कर सकते हैं। कंपनियां स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित कर सकती हैं जो कुत्तों के लिए फूड डिलीवरी या हेल्थ सर्विसेस प्रदान करें। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों के साथ मिलकर शिक्षा कार्यक्रम चला सकते हैं, जहां कुत्तों को वैक्सीनेट किया जाए और अनावश्यक कुत्तों को शेल्टर में भेजा जाए। शहरों में, पशु प्रेमी और कंपनियां मिलकर ‘ट्रैप, न्यूटर, रिलीज’ प्रोग्राम चला सकते हैं, जो कानूनी रूप से अनुमत है। इससे कुत्तों की संख्या नियंत्रित होगी और वे आक्रामक नहीं बनेंगे। कंपनियां अपने कर्मचारियों को एडॉप्शन के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं और पशु प्रेमी क्लब बना सकती हैं जहां अनुभव साझा किए जाएं।
इस संयुक्त प्रयास से न केवल आवारा कुत्तों की समस्या हल होगी बल्कि पशु कल्याण भी सुनिश्चित होगा। सरकार को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, लेकिन समाज की भागीदारी के बिना कोई बदलाव संभव नहीं। भारत में यह समस्या इसलिए गंभीर है क्योंकि हम पशु प्रेम और मानव सुरक्षा को अलग-अलग देखते हैं, जबकि दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती एक अवसर है कि हम सभी मिलकर एक ऐसा भारत बनाएं जहां कुत्ते और इंसान शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहें। पशु प्रेमी आगे आएं, कॉर्पोरेट सहयोग दें और सरकार क्रियान्वयन करे। तभी हम इस समस्या से मुक्ति पा सकेंगे।
*लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।

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